Skip to content
गजल सत्य की नौका पार लाएगी
गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
गजल- उनको आए इक जमाना हो गया
Menu

गजल –

कुछ कहते हैं काम बहुत है।
सच है, पर आराम बहुत है।

चलने से जो भी कतराए,
कहें, शहर में घाम बहुत है।

पैदल चलने में मुश्किल है,
एक बहाना जाम बहुत है।

पीने को अंगूरी लेते,
चाहे उसका दाम बहुत है।

दर्द हुआ है हाथ पैर में,
हर घर में अब बाम बहुत है।

काम करें आतंकवाद के,
इसका भी अंजाम बहुत है।

पैसा-पैसा करते रहते,
जपने को हरि नाम बहुत है।

*आचार्य अनमोल*
दिल्ली
मो० 9968014568

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *