गजल –
कुछ कहते हैं काम बहुत है।
सच है, पर आराम बहुत है।
चलने से जो भी कतराए,
कहें, शहर में घाम बहुत है।
पैदल चलने में मुश्किल है,
एक बहाना जाम बहुत है।
पीने को अंगूरी लेते,
चाहे उसका दाम बहुत है।
दर्द हुआ है हाथ पैर में,
हर घर में अब बाम बहुत है।
काम करें आतंकवाद के,
इसका भी अंजाम बहुत है।
पैसा-पैसा करते रहते,
जपने को हरि नाम बहुत है।
*आचार्य अनमोल*
दिल्ली
मो० 9968014568