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गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
गजल- उनको आए इक जमाना हो गया
गजल- वो खा गए मलाई
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गजल-
दीनों का रूप देखो, मिलता न भोज-पानी।
पीड़ित रहे हैं जन-गण, निर्लज्ज राजधानी।।

इक बार इत्तफाकन, नेता जो बन गया है,
देखी है वक़्ते पीरी, चढ़ती हुई जवानी।

क़ानून अहले ज़र पर, लागू नहीं है कोई,
चलती है बेकसों पर बस इनकी हुक्मरानी।

गुमनाम ज़िन्दगी की, साँसें बहुत ही सीमित,
अश्कों में बह रही है हर अनकही कहानी।

धन की सुरा के मद में, मत राजनीति तोलो,
सब डगमगाए पीकर क्या धूर्त, साधु-ज्ञानी।

‘अनमोल’ रंग उनका, अब तक हुआ न फीका,
जिनके हृदय में अंकित, है राष्ट्र की निशानी।
🙏🙏
आचार्य अनमोल

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