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गजल सत्य की नौका पार लाएगी
गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
गजल- उनको आए इक जमाना हो गया
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गीत-
ये झरोखे हैं प्रदूषित

ये झरोखे हैं प्रदूषित,
विष-हवा नित आ रही।
पश्चिमी आवेश वाली,
गीत ये सिखला रही।।

तिमिर के उजले घरों में,
जो मनुज हैं रह रहे।
कीट गोमय का बने वे,
उच्च शिक्षा कह रहे।
योग की आवो-हवा में,
भोग वायु जा रही।। ये झरोखे….

मन भ्रमित अति कर दिए हैं,
इस बदलती विष हवा ने।
गेह में विष-वृक्ष बोए,
चीमटे से मिल तवा ने।
घुस रही है ये नसों में,
रक्त को भरमा रही।। ये झरोखे….

पश्चिमी परिधान चुपके,
देश में नव भेष लाया।
हर तरफ षड्यंत्र फैला,
सुबुुकता आदर्श पाया।
शर सभी संधान करके,
हर तरफ हर्षा रही।। ये झरोखे….
– आचार्य अनमोल

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