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गीत-रक्षाबंधन
गजल सत्य की नौका पार लाएगी
गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
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गजल-
💥💥💥
हम बदलने पर लगे हैं फैसला इतिहास का।
वे प्रदूषित कर रहे हैं व्याकरण विश्वास का।।

तुमने नादिरशाह लाकर, लूट ली शालीनता,
हम भुलाने पर तुले है, दंश उस संत्रास का।

तुम तभी लाए हलाकू कारनामी काफिले,
हम सजाने जब लगे, नक्शा नए आवास का।

तुमने देके आग, झुलसाई सुघड़ता फूल की,
हम उगाने लग रहे, मौसम मधुर मधुमास का।

त्याग दी तुमने मधुरता, जो हमारी शान थी,
हम जमाने लग रहे, अंकुर प्रणय सुखरास का।

धूल झौंके जा रहे हो, तुम समय की आँख में,
हम बनाने लग रहे, जीवन जगत मृदुहास का।

तुमने गौरी और गजनी, साँप ज़हरीले दिए,
दे रहे ‘अनमोल’ जीवन-रस सुखद परिहास का।।
– आचार्य अनमोल

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