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गीत-रक्षाबंधन
गजल सत्य की नौका पार लाएगी
गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
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मुझको यारो जीने खातिर,
पत्नी प्यारी चाहिए।
पढ़ी-लिखी हो या अनपढ़ हो,
केवल क्वारी चाहिए।।

उसका तन महकाए खुशबू,
रूप परी-सी लगती हो।
मुझको तो सोने दे घर में,
स्वयं रातभर जगती हो।
करे काम वह सारे घर का,
गुण में न्यारी चाहिए।। मुझको…

दो बच्चे होते हैं अच्छे,
यही सोचकर रहता हूँ।
घर में दो बच्चे पाने की,
सदा प्रणय में कहता हूँ।
ध्यान रखे वह बच्चों का भी,
घर महतारी चाहिए।। मुझको…

मेरी बात सदा जो माने,
द्वंद्व कभी ना किया करे।
धौंस सदा उसको दिखलाऊँ,
चुप रहकर ही जिया करे।
हाँ जी, हाँ जी करने वाली,
बस घरवारी चाहिए।। मुझको…

चंद्रमुखी होवे वह तन से,
मृग के नयनों वाली हो।
पतली कमर सुघड़ हो उसकी,
चाल बड़ी मतवाली हो।
चोटी नागिन जैसी होवे,
मुख अवतारी चाहिए।। मुझको…

कोयल जैसी वाणी उसकी,
गज-सी चाल निराली हो।
रति का रूप भरा हो मन में,
मुख पर अतिशय लाली हो।
कोमल वदन कमल-सा जिसका,
इक फुलवारी चाहिए।। मुझको…

शादी की खुशियों की खातिर,
बंगला एक निराला हो।
हँसी-खुशी हम वक्त गुजारें,
दरवाजे पर ताला हो।
नौकर-गाड़ी हमको सारे,
नित सरकारी चाहिए। मुझको…

                       ***

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