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गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
गजल- उनको आए इक जमाना हो गया
गजल- वो खा गए मलाई
गजल- पक्ष ईमान के कमजोर पड़ रहे यारो
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गजल –
हर दिशा अपमान ही अपमान है,
ना कहीं साहित्य का सम्मान है।

आ गया युग चारणी फिर लौटकर,
काव्य मुख पर याचकी पहचान है।

ईश के समकक्ष था जो कवि कभी,
आजकल दरबार का दरबान है।

दूर की जिसने सभी की मन व्यथा,
वह विदूषक मंच का प्रतिमान है।

पान कर मदिरा के प्याले रात दिन,
चेतना से हीन मृत इनसान है।

अब मनोरंजन-मजा कविता हुई,
दीखता न काव्य में युगगान है।

आचरण उजड़े, न जो सुधरे कभी,
ऐसे तुक्कड़ रूप ही छविमान है।

लेखनी ‘अनमोल’ बन के चल रही,
आज वह अब इस जगत में शान है।।
🌹🌹
आचार्य अनमोल
‘अनमोल गजल’ से उद्धृत

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