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गीत-रक्षाबंधन
गजल सत्य की नौका पार लाएगी
गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
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घर से दवाई लाने के लिए जाते समय
मेरा दिमाग सड़ गया
और अपने पर्चे की जगह, नौ महीने की गर्भवती पत्नी का
पर्चा हाथ पड़ गया

मुझे जुकाम खाँसी और पेट में दर्द हो रहा था
इसलिए मैं चलते-चलते भी रो रहा था।
डाॅक्टर के पास पहुँचकर ही मैंने
अपने पेट के दर्द का दुखड़ा सुनाया,
डाॅक्टर ने भी मुझे मेरा पर्चा देखकर
सहानुभूति दिखलाई और स्टूल पर बिठाया।

डाॅक्टर ने फिर से मेरा पर्चा देखा तो
उसका दिमाग चकराया,
फिर मुझे देखकर मुस्कुराया
कहने लगा, ऐसे अकेले मत आया करो
घर में ही रहकर डाॅक्टर को बुलाया करो।

कुछ गुस्सा कुछ प्यार उसको मुझ पर आ रहा था,
लेकिन वह मन ही मन मुस्कुरा रहा था।
उसने अपना मुँह खोला और जोर से बोला-
क्या ऐसा भी होता है?
बच्चों का बोझ बाप भी ढोता है।

मेरी समझ में कुछ नहीं आया,
तब उसने मेरा पेट धीरे से दबाया।
और एक पर्चा थमाया,
उसमें लिखा था-

रोजाना एक कटोरी दही, 200 ग्राम पनीर,
भरपेट रोटी और एक प्लेट सलाद खाना है,
पाँच दिन के बाद फिर से चेकअप कराने के लिए आना है।

मैं जच्चा बार्ड में भर्ती हूँ, पलंग पर सो रहा हूँ
अपनी गलती पर मन नही मन रो रहा हूँ।
रोजाना मेरे बहुत पैसे खर्चे हो रहे हैं और
पूरी गली में चुपके-चुपके मेरे ही चर्चे हो रहे हैं।
कुछ लोग आश्वासन देते हैं, तो कुछ लोग ढाँढस बँधाते हैं,
तो कुछ आगे गलती न करने के लिए
हिदायत भी दे जाते हैं।

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