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हिंदी गजल
हर आदमी को मूर्ख बनाने लगे हैं लोग।
क़ानून का मज़ाक उड़ाने लगे हैं लोग।।

सत्कर्म को भूला के अपने ही भाल पर,
दुर्भाग्य की लकीर बनाने लगे हैं लोग।

भूकम्प पीड़ितों की राहत के नाम पर,
जो हक़ मिला छीनकर खाने लगे हैं लोग।

छन्दों का ज्ञान और न ही काव्य-कल्पना,
क्यूँ खुद को गीतकार कहाने लगे हैं लोग।

महँगे हुए हैं टैक्स से आटा औ दाल भी,
ऐसे बजट को श्रेष्ठ बताने लगे हैं लोग।

जैसे भी मिले जहाँ से मिले धन मिले,
ऊँचे पदों का लाभ कमाने लगे हैं लोग।

‘अनमोल’ लूटखोर को आइना दिखा,
बेशर्म खुद को श्रेष्ठ दिखाने लगे हैं लोग।।
आचार्य अनमोल

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