गजल-
धरा पर दुखों का वपन हो रहा है।
वतन से अमन बेवतन हो रहा है।।
लुटेरे घुसे हैं हमारे वतन में,
सरेआम धन का ग़बन हो रहा है।
अहिंसा की छाती पे हिंसा चढ़ी है,
खुला सरकशी का हवन हो रहा है।
चमन की हिफाज़त जिसे हमने सौंपी,
उन्हीं के ही द्वारा पतन हो रहा है।
न अमृत मिला और न अमरत्व कोई,
कुटिल नीतियों का जतन हो रहा है।
न सिद्धान्त कोई न अस्तित्व कोई,
कि अब धूसरित हर रतन हो रहा है।
है ‘अनमोल’ सब कुछ धोखा-छलावा,
खुशियों का हर दिन क्षरण हो रहा है।।
– आचार्य अनमोल