गीत –
लक्ष्य भी तुझ को है पाना
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ज्ञान का भंडार तू है,
सत्य का अप्रतिम खज़ाना।
दूर मत हो तू स्वयं से,
लक्ष्य भी तुझ को है पाना।।
भ्रम भरा जीवन जगत का,
सत्यता को मान ले।
बोध करके, बुद्ध बन जा,
तू स्वयं को जान ले।
कर वरण जग-चेतना का,
छोड़ दे सब कुछ बहाना।। दूर…
काल के कवलित हृदय पर,
धूल-सा नर दीखता।
भूलकर तू अब स्वयं को,
व्यर्थ में ही चीखता।
खो गया पाथेय पथ का,
कष्ट है निश्चित उठाना।। दूर…
खो दिया है पुण्य तूने,
पथ तिमिर से है घिरा।
बन्द हैं सब द्वार सुख के,
सत्य से मत मुख फिरा।
पार कर दुर्गम वनों को,
दूर इस जग से है जाना।। दूर…
भाव कल्मष भर रहा है,
आज नर अवसाद से।
दीप खुशियों के जलाता,
कलयुगी विज्ञान से।
वक़्त तुझसे पूछता है,
बात सच-सच ही बताना।। दूर…
कर्म के बदले यहाँ पर,
रूप, कुल-बल मिल रहा।
बीज कर्मों का है बोया,
पंक में नित खिल रहा।
कर्म से ‘अनमोल’ बनकर,
गेह अपना खुद सजाना।। दूर…
– आचार्य अनमोल