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गीत-रक्षाबंधन
गजल सत्य की नौका पार लाएगी
गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
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गजल
💥💥💥
लोकचर्चा की अजब तस्वीर देखी क्या कहें।
आदमी में राक्षसी तासीर देखी क्या कहें।।

आज भी जिन्दा हैं उनके शुभ वचन इतिहास में,
न्याय में अन्याय की तहरीर देखी क्या कहें।

काटते देखे गए हैं क्रूर हाथों से गले,
लाश-ए-इन्सान की प्राचीर देखी क्या कहें।

चल पड़ी संवेदना कंधे पे अर्थी लादकर,
दाह से पूरित हृदय की पीर देखी क्या कहें।

धर गए रचकर अमर इतिहास मानव धर्म का,
आज ये लुटती हुई जागीर देखी क्या कहें।

जो जिए ‘अनमोल’ जीवन सब अहिंसा के लिए,
हाथ में उनके सदा शमशीर देखी क्या कहें।।
-आचार्य अनमोल

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