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गीत-रक्षाबंधन
गजल सत्य की नौका पार लाएगी
गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
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गजल
हो जिसमें लोकहित वो साधना हम भूल बैठे हैं।
दीन के दुख-दर्द की हर कामना हम भूल बैठे हैं।

हुए हैं रात-दिन हम व्यस्त केवल धन कमाने में,
फँसे माया में प्रभु की वन्दना हम भूल बैठे हैं।

मिले सुख-शांति इस जग को मतलब नहीं कोई,
सुखों की चाह में संवेदना हम भूल बैठे हैं।

चढ़ाएँ हम सुमन कैसे भरा है पाप जब मन में,
मिले जीवन में दर्शन भावना हम भूल बैठे हैं।

हों मालामाल हम जल्दी करें सब वन्दना अपनी,
हुए पापी प्रभु-आराधना हम भूल बैठे हैं।

जहाँ में भोगते हैं सुख निरन्तर कामिनी-कंचन,
बुजुर्गों ने सही जो यातना हम भूल बैठे हैं।

प्रभु देने को आतुर हैं हमें वरदान मनचाहा,
करें ‘अनमोल’ सी शुभ याचना हम भूल बैठे हैं।
🌹🌹

आचार्य अनमोल

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