गजल-
कोशिश तो की है हमने, अँधेरा गया नहीं।
धोखे का इस जहाँ से, बसेरा गया नहीं।।
हर ओर छा रही है, तबाही की दास्तां,
क्यों जालिमों को अब तलक, घेरा गया नहीं।
फुंकार से ही जब, दहल जाता है वदन,
क्यों विषधरों की ओर, सपेरा गया नहीं।
जाना है सब जहान की, दौलत को छोड़कर,
फिर किसके लिए तेरा, ये मेरा गया नहीं।
सूनी पड़ी है देखिए, तहज़ीब की ज़मीं,
क्यों बीज उसमें सच का, बिखेरा गया नहीं।
कितनी तनातनी है अब, कुर्सी के वास्ते,
‘अनमोल’ मन से पाप का, ये डेरा गया नहीं।।
– आचार्य अनमोल