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गीत-रक्षाबंधन
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गजल- निर्लज्ज राजधानी
गीत- रोते रहना ठीक नहीं
गजल- ना कहीं साहित्य का सम्मान है
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टूट रहे संबंध
भूल रहे हम अपनेपन का,
घर वाला अनुबंध,
स्वारथ में हम भरे हुए हैं,
टूट रहे सम्बंध।।

आपाधापी के कारण ही,
छूट रहे सब काम।
धन के मद में लगा हुआ है,
मन में पूर्ण विराम।
प्रेम भाव में सबके देखा,
आपस में प्रतिबंध।। भूल…

जीवन की बगिया में हम ही,
लिखते नित्य कहानी।
लेकिन हमने बिसराई हैं,
माता, दादी, नानी।
दुनिया को दिखलाने को ही,
लिखते व्यर्थ निबंध।। भूल…

घर में कटुता भरी हुई है,
मात-पिता को भूले,
फूल सभी खुशियों के सूखे,
टूट रहे हैं कूल्हे।
प्यार भरी बातों की अब तो,
मिलती नहीं सुगन्ध।। भूल…

शहरी जीवन के दूषण ने,
छीना सब आराम।
निज जीवन के प्यार-पाश में,
दूर हुआ प्रभु नाम।
कैसे हम अब इसको मानें,
जीवन सुखद प्रबंध।। भूल…

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अरुण मिश्र
अरुण मिश्र
1 year ago

वर्तमान समाज की वास्तविकता को इस गीत में बहुत ढंग से प्रयोग किया गया है।
अरुणा मिश्रा

Bhuvnesh Sharma
Bhuvnesh Sharma
1 year ago

अद्भुत , इस गीत के माध्यम से समाज में सुंदर विचार को प्रस्तुत किया ,,
भुवनेश शर्मा

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