गजल
चुगली करते उनको देखा, जो होते हैं खाली लोग।
कुछ होते हैं बड़े कनस्तर, कुछ बेपेंदी के प्याली लोग।
घर में विपदा आन पड़ी जब, स्वर्गवास में पिता हुए,
तेरहवीं में आकर सारे, खा गए भर-भर थाली लोग।
आग लगी जब मेरे घर में, लोग मजा लेने आए,
कब, क्यों, कैसे पूछ रहे थे, केवल बने सवाली लोग।
जीवन में सत्पथ पर चलना, जाने क्यों सब भूल गए,
खाने से पहले थाली में, करते देखा-भाली लोग।
सुंदर छंद, भाव भी सुंदर, ये बातें हैं अति बेजोड़,
सुनकर के ‘अनमोल’ गजल को, खूब बजाते ताली लोग।।
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आचार्य अनमोल
दिल्ली